इसवी सन १९११ साल की
ये बात है . पुणे के एक शिक्षक परिवार में ३ मूर्तियाँ थी- वह स्वयं, उनकी
धर्मपत्नी और एक ४ वर्षीय बालक. उस समय श्री स्वामी का चातुर्मास निजाम संस्थान के
अंतर्गत आने वाले श्री क्षेत्र कुरवपुर में श्रीकृष्णा नदी के तट पर श्री वल्लभ
स्वामी मंदिर के टापू पर था.
एक उल्लेखनीय बात यह
है कि श्री रामदास स्वामी की जन्म स्थली जाम्बगाँव, नृसिंह सरस्वती की कर्म भूमिश्री
क्षेत्र गाणगापुर एवं एकनाथ महाराज का शहर पैठण, ये सभी निजाम संस्थान के अंतर्गत
आते थे.
यह छोटा सा परिवार श्री
स्वामी के दर्शन के लिए प्रस्थान करता है. उस समय पूरा भारत देश प्लेग की महामारी
से ग्रस्त था. हजारों लोग काल-कवलित हो रहे थे. इसलिए उन दिनों प्लेग के कारण जगह-जगह
क्वारंटाइन लागू किया जाता था. क्वारंटाइन अर्थात रोगग्रस्त क्षेत्र से आने वाले लोगों
को कुछ समय के लिए किसी बाहरी स्थान पर रोककर रखना ताकि उनमें से अगर कोई
रोगग्रस्त हो (और उसके लक्षण प्रगट न होने से उपरी तौर पर स्वस्थ दिखता हो ) तो
उसके कारण गंतव्य की जगह में यह रोग ना फैले.