यह बात इसवी सन १९१२
की है, उस समय श्री स्वामी का चातुर्मास श्री क्षेत्र चिखलदा में हुवा था. श्री
स्वामी की कीर्ति सुनकर दूर –दूर से पंडित, विद्वान, अशिक्षित, अमीर-गरीब व अन्य
विभिन्न प्रकार लोग उनके दर्शन करने हेतु वहाँ पर आने लगे थे. स्वामी जी उनकी
विभिन्न समस्याओं का समाधान करते थे और समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होने के लिए
आवश्यक उपासना व साधना के बारे में भी मार्गदर्शन करते थे.
वहाँ पर एक जागीरदार
परिवार की एक महिला श्री स्वामी के दर्शन हेतु आई हुई थी. उस महिला के परिवार की जागीर
राजा ने जब्त कर ली थी.
वैसे तो राजा और वर्षा
के द्वारा प्राप्त नुकसान व तकलीफों की क्या कही शिकायत होती है ? पर वह
महिला बड़ी ही आशा के साथ श्री स्वामी की शरण में आई थी.
वह महिला आकर स्वामी
जी से कहती है :- “हमें आपसे एकांत में कुछ चर्चा करनी है .”
स्वामी जी कहते है:
-“वह कैसे संभव है ? यहाँ-वहाँ सभी दूर श्री हरि व्याप्त है. आपको जो भी कहना है
यही पर निःसंकोच होकर कहिये.”
वह महिला अपनी
सम्पूर्ण व्यथा सुनाती है.