Sunday, January 28, 2018

१६ सद्गुरु चरणों में सब कुछ है

स्वामीजी उस समय गरुडेश्वर थे.बडोदा शहर के समीप होने से वहाँ के अनेक भक्तों को श्रीस्वामी के दर्शन करना अत्यंत सुलभ हो गया था.
चान्दोड़ से एक नाव में बैठकर कुछ बड़ोदा के भक्तजन गरुडेश्वर आ रहे थे.उस नाव में एक विधवा महिला भी थी. नाव में सवार कुछ व्यक्ति जहांनाम स्मरण में लगे हुवे थे, वही कुछ लोग उस विधवा महिला कों बिना किसी कारण जली-कटी बातों से अपमानित करते रहते है.
वह अकेली महिला करती तो भी क्या ? और शिकायत करती तो भी किससे? वह चुपचाप अपना सर झुकाए आँसुभरी आँखेंलिए बैठी रहती है.
आखिर कुछ घंटों बाद नाव आखिर गरुडेश्वर पहुँच ही जाती है, वहाँ पहुँचते-पहुँचते रात हो जाती है.

१५ जैसा अधिकार वैसा उपदेश


उस समय श्रीस्वामी का मुक्काम श्री क्षेत्र नृसिंहवाड़ी में था. स्वामीजी का भिक्षा के बाद का भोजन ब्रह्मानंद स्वामी के मठ की उपरी मंजिल पर होता था. स्वामीजी के भोजन के पश्चात उनकी झूठी पत्तल उठाकर उसके नीचे की जमीन को लिप कर साफ़ करने का पुण्य मिले, इस कारण से वहाँ की स्थानीय महिलाओंकी आपस में अकसर तकरार और झड़पें होती रहती थी, कभी-कभी महिलाओं में तो झगड़े की नौबत आ जाया करती थी.
 ‘पता नहीं मेरे भोजन के पश्चात आज क्या होगा’ इस विचार  से श्रीस्वामी को उन दिनों ढंग से खाना भी खवाता था या नहीं !
एक बार एक दूरस्थ महिला की भी श्रीस्वामी की झूठी पत्तल हटाकर श्रीस्वामी की झुठन साफ़ करने की इच्छा हुई, पर यह कैसे संभव था ? स्थानीय महिलाओं को आपस में जूझते देख वह दूरस्थ महिला चुपचाप दूर खड़ी रहती थी.

१४ हर कार्य का उचित समय होता है

उस समय श्री स्वामी का वास्तव्य श्री क्षेत्र माणगाँव में था. तब एक सज्जन हर शनिवार को सावंतवाड़ी तालुका से स्वामी जी के दर्शन के लिए माणगाँव आते थे,वहाँ पर रविवार के दिन रुकते थे, और सोमवार को तड़के ही उठकर अपने तालुका पहुँचकर अपनी नौकरी में हाजिर हो जाते थे.
पहिले कुछ दिन उन्होंनेस्वामी जी की परीक्षा देखने का मानस बनायाहुवा था.
एक दिन वे बैलगाड़ी से श्री क्षेत्र जाने के बजाय पैदल ही १४ किलोमीटर चलकर माणगाँव पहुँचते है, साथ में एक पात्र में दूध भी रख लेते है.

१३ सर्वज्ञ श्री स्वामी


जब श्रीक्षेत्र हवनुर में स्वामीजी का चातुर्मास था, तब एक अमीर महिला अपने मुनीम के साथ श्रीस्वामी के दर्शन करने आती है. श्रीस्वामी के चरण स्पर्श के बाद मुनीमजी अपनी सेठानी की दारुण समस्या से स्वामीजी को अवगत कराते है-“
स्वामीजी, जब भी सेठानी जी गर्भधारण करती है तब गर्भधारण के ५-६ महीनों के पश्चात उनके पति पर एक रहस्यमय दौरा पड़ता है, पति देव का तो दिमाग ही घूम जाता है, और जब तक बालक जन्म लेकर जीवित रहता है, तब तक दौरा बना ही रहता है; उस बालक के निधन होने के बाद पति देव फिर से सामान्य हो जाते है.
अभी तक ऐसा ३-४ बार हो चूका है, अब फिर से सेठानी जी पेट से है, और पुरानी यादों से उनके प्राण ही सूखे जा रहे है.इस संकट से छुटकारा दिलाने में स्वामी चरण समर्थ है.”

१२ सुख के सब रिश्ते-नाते, दुःख में सिर्फ सद्गुरु का सहारा

उस समय श्री स्वामी का मुक्काम नृसिंहवाड़ी में था. स्वामीजी के आने के कारण वहाँ का तो माहोल ही बदल गया था. लोगों की आवाजाहीअत्यधिक होने से टाँगे-वालों ने अपना किराया बढ़ा दिया था, पुजारियों को उनके भोजन के लिए भी समय ना मिले इतनी उनकी व्यस्तता हो गई थी. सुबह तडके ४ बजे से ठीक आधी रात तक मंदिर व ब्रह्मानंदस्वामी के मठ में चहल-पहल रहा करती थी, जहां जाओ वहाँ पर श्री स्वामी की लीलाये कानों पर पड़ती थी, और भक्ति भाव को और भी दृढ़ कर देती थी.

११ पथ-प्रदर्शक श्रीस्वामी

इसवी सन १९११ साल की ये बात है . पुणे के एक शिक्षक परिवार में ३ मूर्तियाँ थी- वह स्वयं, उनकी धर्मपत्नी और एक ४ वर्षीय बालक. उस समय श्री स्वामी का चातुर्मास निजाम संस्थान के अंतर्गत आने वाले श्री क्षेत्र कुरवपुर में श्रीकृष्णा नदी के तट पर श्री वल्लभ स्वामी मंदिर के टापू पर था.
एक उल्लेखनीय बात यह है कि श्री रामदास स्वामी की जन्म स्थली जाम्बगाँव, नृसिंह सरस्वती की कर्म भूमिश्री क्षेत्र गाणगापुर एवं एकनाथ महाराज का शहर पैठण, ये सभी निजाम संस्थान के अंतर्गत आते थे.
यह छोटा सा परिवार श्री स्वामी के दर्शन के लिए प्रस्थान करता है. उस समय पूरा भारत देश प्लेग की महामारी से ग्रस्त था. हजारों लोग काल-कवलित हो रहे थे. इसलिए उन दिनों प्लेग के कारण जगह-जगह क्वारंटाइन लागू किया जाता था. क्वारंटाइन अर्थात रोगग्रस्त क्षेत्र से आने वाले लोगों को कुछ समय के लिए किसी बाहरी स्थान पर रोककर रखना ताकि उनमें से अगर कोई रोगग्रस्त हो (और उसके लक्षण प्रगट न होने से उपरी तौर पर स्वस्थ दिखता हो ) तो उसके कारण गंतव्य की जगह में यह रोग ना फैले.

१० भावग्राह्य श्री स्वामी

पैन गंगा (यह गोदावरी नदी की सहायक नदी है ) नदी के किनारे निजाम  संस्थान के अंतर्गत आने वाले पावनी नामक गाँव  में श्री स्वामी के सानिध्य में एक यज्ञ का अनुष्ठान होता है. अनुष्ठान  के लिए अनेक याज्ञिक-जन दूर-दूर से आये हुवे थे. साथ ही दर्शन के उद्देश्य से भी भक्तों के भी हुजूम के हुजूम आ रहे थे. मुक्त-हस्त से सबको अन्न-प्रसादी की व्यवस्था मानो स्वयं दत्त प्रभु ही कर रहे थे.
वहाँ पर एक मराठी देशस्थ ब्राह्मण परिवार भी दर्शनार्थ आया हुवा था. बड़े-छोटे, बाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुषों से भरे इस परिवार में एक तरुण युवक भी था. पूरा परिवार स्वामी जी के दर्शन को जाता था पर यह युवक उनके साथ नहीं जाता था.

९ मन्त्र की शक्ति


यह बात इसवी सन १९१२ की है, उस समय श्री स्वामी का चातुर्मास श्री क्षेत्र चिखलदा में हुवा था. श्री स्वामी की कीर्ति सुनकर दूर –दूर से पंडित, विद्वान, अशिक्षित, अमीर-गरीब व अन्य विभिन्न प्रकार लोग उनके दर्शन करने हेतु वहाँ पर आने लगे थे. स्वामी जी उनकी विभिन्न समस्याओं का समाधान करते थे और समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होने के लिए आवश्यक उपासना व साधना के बारे में भी मार्गदर्शन करते थे.
वहाँ पर एक जागीरदार परिवार की एक महिला श्री स्वामी के दर्शन हेतु आई हुई थी. उस महिला के परिवार की जागीर राजा ने जब्त कर ली थी.
वैसे तो राजा और वर्षा के द्वारा प्राप्त नुकसान व तकलीफों की क्या कही शिकायत होती है ?  पर  वह महिला बड़ी ही आशा के साथ श्री स्वामी की शरण में आई थी.
वह महिला आकर स्वामी जी से कहती है :- “हमें आपसे एकांत में कुछ चर्चा करनी है .”
स्वामी जी कहते है: -“वह कैसे संभव है ? यहाँ-वहाँ सभी दूर श्री हरि व्याप्त है. आपको जो भी कहना है यही पर निःसंकोच होकर कहिये.”
वह महिला अपनी सम्पूर्ण व्यथा सुनाती है.

८ भक्तवत्सल श्री टेम्बे स्वामी

यह कथा इसवी सन १९१3 की है, जब श्री स्वामी का वास्तवश्री क्षेत्रगरुडेश्वर में था. उस समय एक विधवा महिला उनके दर्शन के लिए आई थी, दर्शन करते ही वह मुंग सें भरा एक दोना स्वामीजी के सामने रख देती है. वही पर रसोई बनाने वाली एक महिला भी वहाँमौजूद थी.रसोई बनाने वाली महिला उस विधवा स्त्री पर एकदम-जोर से चिल्लाती है :-“ अरे, तुम्हें क्या इतनी भी समझ नहीं है कि इस मुंग के बड़े-बड़े अंकुर फुट गए है, और अब यह कुछ काम का नहीं है !” पूरा वातावरण एकदम से स्तब्ध रह जाता है.
वह विधवा महिला एकदम रूवांसी हो जाती है पर वह कुछ भी नहीं बोलती है.

Sunday, December 31, 2017

7 जब आधि (मानसिक विकार व रोग ) में न काम आये चिकित्सा तब वहाँ चाहिए आध्यात्मिक उपासना

मुंबई के एक स्नातक व्यक्ति अच्छी सरकारी नौकरी में थे, उनके दिन बड़े मजे में कट रहे थे, पर अचानक वे बीमार पड जाते है.
यह इसवी सन १९११ की घटना है. मित्रों ने सलाह दी कि पुणे की आबोहवा अच्छी है, वहाँ जाकर आपका स्वास्थ्य सुधर जायेगा.
फिर क्या वह सज्जन परिवार सहित पुणे आ गए और उन्हें शनिवार पेठ में एक आरामदेह भवन उन्हें रहवास करने के लिए मिल गया. पुणे में आकर उनका स्वास्थ्य तो  ठीक हो गया पर उन्हें हर पल मृत्यु के समीप आने का आभास होता था, मृत्यु के भय से वे सदा ग्रसित रहते थे, वे अकसर “ मैं मर जाऊंगा.... मैं मर जाऊंगा....”  ऐसा बोलते रहते थे. उनकी ऐसी बाते सुनकर उनके घरवाले अत्यंत चिंतित हो जाया करते थे. डाक्टर भी आकर स्वास्थ्य-परीक्षण कर के जाते थे पर कोई भी रोग उनकी पकड़ में नहीं आता था. उनके पड़ोस के घर में दत्त-उपासना की रीत थी, इन बीमार सज्जन के कानों पर भी करुणा-त्रिपदी के शब्द पड़ते है. शब्द सुनते ही यह सज्जन तरो-ताज़ा महसूस करने लगते है.