श्री टेम्बे स्वामी से वेदांत श्रवण करने का महाभाग्य जिन
महानुभावों को मिला उनमें बड़ोदा के राम शास्त्री
प्रभाकर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. शास्त्रीजी अध्ययन हेतु अपने मामा के
यहाँ शिनोर में रहते थे. वे सिर्फ १८ वर्ष के ही थे जब प्लेग के कारण उनके पिताश्री की
मृत्यु हो जाती है.
पिताजी का साया उठ जाने से
शास्त्रीजी बहुत ही निराश हो जाते है और इस कारण से वे गृह त्याग करने का मानस बना
लेते है.
तभी उनके स्वप्न में एक
सन्यासी आकर उनसे कहते है, “ अरे, आप अगर वन में चले जायेंगे तो आपकी माँ कितने
दुखो को प्राप्त होगी ? इस बात का विचार भी किया है या नहीं ?
जब कर्दम ऋषि वन में गए थे तब उनके पुत्र
कपिल मुनि भी अपनी माँ को त्याग कर वन में नहीं गए वरन उन्होंने अपनी माँ को
अध्यात्म उपदेश देकर शोक रहित किया.
संन्यासी जी आगे कहते है, “मात्रे अध्यात्मनिवेदनम्” (माता को अध्यात्म निवेदन किया)