उस समय मध्य प्रदेश
के सनावद नामक स्थान पर श्रीस्वामी का वास्तव्य था। स्वामीजी के पूर्वाश्रम के
पिताजी के श्राद्ध का दिवस था. श्रीस्वामी के साथ उनके पूर्वाश्रम के भाई श्री
सीतारामजी और प. पु. योगानंद सरस्वती ( गांडा महाराज ) थे। वे चातुर्मास के दिन थे,
श्राद्ध के लिए रसोई
बनानी थी. श्रीस्वामी ने स्पष्ट निर्देश दे रखा था कि रसोई नदी के तट पर न
बनाकर गाँव में ही बनाई जाए, पर गांडा महाराज ने आग्रह किया,
" अभी कही से भी वर्षा
की कोई संभावना नही दिख
रही है, इसलिए रसोई नदी के तट
पर ही बनवा लेते है.”
इस पर श्रीस्वामी मौन रहते है. श्री स्वामी के
मौन का अर्थ अकसर नकारात्मक होता था पर इस बात पर श्री गांडा
महाराज ज्यादा ध्यान नहीं देते है.