Sunday, January 28, 2018

२३ प्रकृति पर श्रीस्वामी की सत्ता

उस समय मध्य प्रदेश के सनावद नामक स्थान पर श्रीस्वामी का वास्तव्य था। स्वामीजी के पूर्वाश्रम के पिताजी के श्राद्ध का दिवस था. श्रीस्वामी के साथ उनके पूर्वाश्रम के भाई श्री सीतारामजी और प. पु. योगानंद सरस्वती ( गांडा महाराज ) थे। वे चातुर्मास के दिन थे, श्राद्ध के लिए रसोई  बनानी थी. श्रीस्वामी ने स्पष्ट निर्देश दे रखा था कि रसोई नदी के तट पर न बनाकर गाँव में ही बनाई जाए, पर गांडा महाराज ने आग्रह किया, " अभी कही से भी वर्षा की कोई  संभावना नही दिख रही है, इसलिए रसोई नदी के तट पर ही बनवा लेते है.”
  इस पर श्रीस्वामी मौन रहते है. श्री स्वामी के मौन का अर्थ अकसर नकारात्मक होता था पर इस बात पर श्री गांडा महाराज ज्यादा ध्यान नहीं देते है.

२२ साईबाबा परब्रह्म है

श्रीस्वामी अत्यंत कर्मठ उपासक थे, वेद विद्या व मंत्र विद्या पर उनका पूर्ण अधिकार था. साईबाबा व श्रीस्वामी एक दूसरे को बंधूँ कह कर संबोधित करते थे. एक बार टेंबेस्वामी राजमहेंद्री में ठहरे हुआ थे. वहाँ पर नांदेड से आये हुए पुंडलिकराव वकील व उनके दो मित्र टेंबेस्वामी से मिलने आते है. बातों-बातों में शिर्डी के साईबाबा का उल्लेख  होता है, यह नाम सुनते ही टेंबेस्वामी भावुक होकर बाबा का स्मरण कर हाथ जोड़ते है. सन्यास धर्म के नियमानुसार एक यति ने अपनी माता व गुरु को छोड़कर अन्य किसी को भी प्रणाम नहीं करना चाहिए, इसी कारण पुंडलिकराव और उनके मित्रों को विस्मय होता है. स्वामीजी तुरंत स्पष्टीकरण देते है कि साईबाबा कोई सामान्य व्यक्ति या अवलिया न होकर पूर्ण ब्रह्म नारायण है. पुंडलिकराव वकील साईं भक्त थे, इसीलिए श्रीस्वामी उनसे ‘शिर्डी कब जाओगे ?’ ऐसा पूछते है.

२१ मन चंगा तो कठोती में गंगा

इसवी सन १९१३ में श्रीस्वामी का एक चातुर्मास होलकर संस्थान के अंतर्गत आने वाले श्री क्षेत्र चिखलदा में था. उस दिन श्रावण मास की संकष्ट चतुर्थी थी. भोजन के उपरांत सभी भक्त लोग इकट्ठे बैठे हुवे थे, तभी श्रीस्वामी का वहाँ आगमन होता है.
श्रीस्वामी एक वृतांत सुनाते  है, ‘हम एक बार तेलंगाना गए थे, तब एक विद्यार्थी आकर हमें नमस्कार करता है, और पुछने पर कि नमस्कार किस हेतु से किया, वह बताता है कि पास आ चुकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के हेतु से नमस्कार किया है. हमने उसे फिर ‘भाव फले’ ऐसा प्रत्युत्तर दिया. वह विद्यार्थी संस्कृत की तृतीया परीक्षा में बैठ रहा था, और उसे पहली दोनों परीक्षाओं में पारितोषिक भी मिल चुके थे. हमने उससे आगे पूछा कि पहली दो परीक्षाओं में कौन से ग्रन्थ थे, इस पर वह बताता है कि प्रथमा में रामानुजाचार्य की गीता थी और द्वितीया में माधवाचार्य की गीता थी और इस बार श्रीमत् आदिशंकराचार्यजी की गीता है.’

२० बिना सुयोग सद्गुरु दर्शन नाही

एक स्नातक ब्राह्मण सज्जन एक अच्छे पद पर नियुक्त थे, उनकी श्रीस्वामी में अपार श्रद्धा थी. जरा सी छुट्टियाँ मिली नहीं कि वे श्री चरणों में जाकर अपनी सेवा प्रदान किया करते थे. उनका एक अच्छा मित्र स्वदेशी का आग्रही व्रत धारी था. उस समय देश पराधीन था और स्वतंत्रता के लिए अनेक प्रयत्न चल रहे थे जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार भी शामिल था.
एक दिन ये स्वदेशी के भक्तब्राह्मण-महोदय से बहस करने लगे, ‘कहिये, स्वामीजी के स्वदेशी के बारे में क्या विचार है ?’
ब्राह्मण महोदय ने अत्यंत प्रांजलतापूर्वक कहा, ‘ स्वामीजी से वाद करने की न तो मेरी पात्रता है और न हि सद्गुरु से वाद करने की कोई पद्धति होती है. उनकी आज्ञा का प्रेम व आदरपूर्वक पालन करना ही मेरा परम व्रत है.'

१९ हार्दिक समाधान ही ईश्वर है

मुंबई में रहने वाले एक सज्जन को अनेक स्थानों पर श्रीस्वामी के दर्शन का सौभाग्य मिल चूका था, सनातन वैदिक धर्म के कई रहस्य उन्हें श्रीस्वामी से ही अवगत हुवे थे. उन्होंने एक बार सोचा कि यह लाभ तो सिर्फ उन्हीं तक सीमित रहेगा, पर अगर पुरोहित लोगों को यह ज्ञान मिले तो समाज के एक बड़े तबके तक यह ज्ञान पहुँचेगा. इस हेतु के लिए वे अपने एक पुरोहित मित्र को साथ लेकर श्रीस्वामी के दर्शन को जाने का मानस बनाते है.
पर पुरोहित जी कहते है:-“अरे श्रीस्वामी तो ठहरे सन्यासी, उनके दर्शन तो सिर्फ चातुर्मास में होंगे, और चातुर्मास तो हमारे लिए  कमाई का समय होता है. इस समय में शहर के बाहर कैसे जाया जा सकता है ? आपको जाना है तो आप अकेले ही चले जाइएगा .”

१८ दवा के साथ दुआ

इसवी सन १९०९ में कन्यागत (हर 12 साल में आने वाला एक पर्व) के समय श्रीस्वामी का वास्तव्य नृसिंहवाड़ी में था. उधर सातारा में एक सज्जन एक अपने पेट दर्द की समस्या से काफी त्रस्त थे, उन्होंने काफी देशी-विदेशी इलाजकरेंथे पर उन्हें कुछ भी फायदा नहीं हुवा था. इन सज्जन के कानों पर जब श्रीस्वामी की कीर्ति पड़ी तो उन्होंने श्रीस्वामी के दर्शनों के लिए आने का निश्चय कर लिया.
रास्ते में उन्हें अनेक तरह के विचार आने लगे कि श्रीस्वामी का सोवला तो बड़ा कड़क होगा और मैं ठहरा द्वितीयवर्णीय महाराष्ट्रियन व्यक्ति, क्या मुझे दर्शन का लाभ होगा भी या नहीं ? अगर हो भी गया तो पुजन आदि करने को मिलेगा भी या नहीं ?

१७ वासुदेवः सर्वम्

श्रीक्षेत्र गरुडेश्वर में एक ही समय अनेक भक्तजन श्रीस्वामी के सम्मुख बैठे हुवे थे.
उस समय श्री स्वामी एक भक्त से पूछते है:-“ आपकी लड़की विवाह योग्य हो गई है न ? कही उसका रिश्ता तय कर दिया है क्या ?”
वह सज्जन कहते है :-“ महाराज, बड़े ही प्रयत्न हम कर रहे है, पर दिन बड़े ही कठिन आ गए है ! कही पर भी कोई अच्छा रिश्ता नहीं दिखता है.”
फिर श्रीस्वामी पूछते है :-“ क्या-क्या प्रयत्न करेहै, जरा हमें भी तो बताओ ?”
वह सज्जन सब विस्तार से बतला देते है.

१६ सद्गुरु चरणों में सब कुछ है

स्वामीजी उस समय गरुडेश्वर थे.बडोदा शहर के समीप होने से वहाँ के अनेक भक्तों को श्रीस्वामी के दर्शन करना अत्यंत सुलभ हो गया था.
चान्दोड़ से एक नाव में बैठकर कुछ बड़ोदा के भक्तजन गरुडेश्वर आ रहे थे.उस नाव में एक विधवा महिला भी थी. नाव में सवार कुछ व्यक्ति जहांनाम स्मरण में लगे हुवे थे, वही कुछ लोग उस विधवा महिला कों बिना किसी कारण जली-कटी बातों से अपमानित करते रहते है.
वह अकेली महिला करती तो भी क्या ? और शिकायत करती तो भी किससे? वह चुपचाप अपना सर झुकाए आँसुभरी आँखेंलिए बैठी रहती है.
आखिर कुछ घंटों बाद नाव आखिर गरुडेश्वर पहुँच ही जाती है, वहाँ पहुँचते-पहुँचते रात हो जाती है.

१५ जैसा अधिकार वैसा उपदेश


उस समय श्रीस्वामी का मुक्काम श्री क्षेत्र नृसिंहवाड़ी में था. स्वामीजी का भिक्षा के बाद का भोजन ब्रह्मानंद स्वामी के मठ की उपरी मंजिल पर होता था. स्वामीजी के भोजन के पश्चात उनकी झूठी पत्तल उठाकर उसके नीचे की जमीन को लिप कर साफ़ करने का पुण्य मिले, इस कारण से वहाँ की स्थानीय महिलाओंकी आपस में अकसर तकरार और झड़पें होती रहती थी, कभी-कभी महिलाओं में तो झगड़े की नौबत आ जाया करती थी.
 ‘पता नहीं मेरे भोजन के पश्चात आज क्या होगा’ इस विचार  से श्रीस्वामी को उन दिनों ढंग से खाना भी खवाता था या नहीं !
एक बार एक दूरस्थ महिला की भी श्रीस्वामी की झूठी पत्तल हटाकर श्रीस्वामी की झुठन साफ़ करने की इच्छा हुई, पर यह कैसे संभव था ? स्थानीय महिलाओं को आपस में जूझते देख वह दूरस्थ महिला चुपचाप दूर खड़ी रहती थी.

१४ हर कार्य का उचित समय होता है

उस समय श्री स्वामी का वास्तव्य श्री क्षेत्र माणगाँव में था. तब एक सज्जन हर शनिवार को सावंतवाड़ी तालुका से स्वामी जी के दर्शन के लिए माणगाँव आते थे,वहाँ पर रविवार के दिन रुकते थे, और सोमवार को तड़के ही उठकर अपने तालुका पहुँचकर अपनी नौकरी में हाजिर हो जाते थे.
पहिले कुछ दिन उन्होंनेस्वामी जी की परीक्षा देखने का मानस बनायाहुवा था.
एक दिन वे बैलगाड़ी से श्री क्षेत्र जाने के बजाय पैदल ही १४ किलोमीटर चलकर माणगाँव पहुँचते है, साथ में एक पात्र में दूध भी रख लेते है.