Sunday, January 28, 2018

२० बिना सुयोग सद्गुरु दर्शन नाही

एक स्नातक ब्राह्मण सज्जन एक अच्छे पद पर नियुक्त थे, उनकी श्रीस्वामी में अपार श्रद्धा थी. जरा सी छुट्टियाँ मिली नहीं कि वे श्री चरणों में जाकर अपनी सेवा प्रदान किया करते थे. उनका एक अच्छा मित्र स्वदेशी का आग्रही व्रत धारी था. उस समय देश पराधीन था और स्वतंत्रता के लिए अनेक प्रयत्न चल रहे थे जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार भी शामिल था.
एक दिन ये स्वदेशी के भक्तब्राह्मण-महोदय से बहस करने लगे, ‘कहिये, स्वामीजी के स्वदेशी के बारे में क्या विचार है ?’
ब्राह्मण महोदय ने अत्यंत प्रांजलतापूर्वक कहा, ‘ स्वामीजी से वाद करने की न तो मेरी पात्रता है और न हि सद्गुरु से वाद करने की कोई पद्धति होती है. उनकी आज्ञा का प्रेम व आदरपूर्वक पालन करना ही मेरा परम व्रत है.'

१९ हार्दिक समाधान ही ईश्वर है

मुंबई में रहने वाले एक सज्जन को अनेक स्थानों पर श्रीस्वामी के दर्शन का सौभाग्य मिल चूका था, सनातन वैदिक धर्म के कई रहस्य उन्हें श्रीस्वामी से ही अवगत हुवे थे. उन्होंने एक बार सोचा कि यह लाभ तो सिर्फ उन्हीं तक सीमित रहेगा, पर अगर पुरोहित लोगों को यह ज्ञान मिले तो समाज के एक बड़े तबके तक यह ज्ञान पहुँचेगा. इस हेतु के लिए वे अपने एक पुरोहित मित्र को साथ लेकर श्रीस्वामी के दर्शन को जाने का मानस बनाते है.
पर पुरोहित जी कहते है:-“अरे श्रीस्वामी तो ठहरे सन्यासी, उनके दर्शन तो सिर्फ चातुर्मास में होंगे, और चातुर्मास तो हमारे लिए  कमाई का समय होता है. इस समय में शहर के बाहर कैसे जाया जा सकता है ? आपको जाना है तो आप अकेले ही चले जाइएगा .”

१८ दवा के साथ दुआ

इसवी सन १९०९ में कन्यागत (हर 12 साल में आने वाला एक पर्व) के समय श्रीस्वामी का वास्तव्य नृसिंहवाड़ी में था. उधर सातारा में एक सज्जन एक अपने पेट दर्द की समस्या से काफी त्रस्त थे, उन्होंने काफी देशी-विदेशी इलाजकरेंथे पर उन्हें कुछ भी फायदा नहीं हुवा था. इन सज्जन के कानों पर जब श्रीस्वामी की कीर्ति पड़ी तो उन्होंने श्रीस्वामी के दर्शनों के लिए आने का निश्चय कर लिया.
रास्ते में उन्हें अनेक तरह के विचार आने लगे कि श्रीस्वामी का सोवला तो बड़ा कड़क होगा और मैं ठहरा द्वितीयवर्णीय महाराष्ट्रियन व्यक्ति, क्या मुझे दर्शन का लाभ होगा भी या नहीं ? अगर हो भी गया तो पुजन आदि करने को मिलेगा भी या नहीं ?

१७ वासुदेवः सर्वम्

श्रीक्षेत्र गरुडेश्वर में एक ही समय अनेक भक्तजन श्रीस्वामी के सम्मुख बैठे हुवे थे.
उस समय श्री स्वामी एक भक्त से पूछते है:-“ आपकी लड़की विवाह योग्य हो गई है न ? कही उसका रिश्ता तय कर दिया है क्या ?”
वह सज्जन कहते है :-“ महाराज, बड़े ही प्रयत्न हम कर रहे है, पर दिन बड़े ही कठिन आ गए है ! कही पर भी कोई अच्छा रिश्ता नहीं दिखता है.”
फिर श्रीस्वामी पूछते है :-“ क्या-क्या प्रयत्न करेहै, जरा हमें भी तो बताओ ?”
वह सज्जन सब विस्तार से बतला देते है.

१६ सद्गुरु चरणों में सब कुछ है

स्वामीजी उस समय गरुडेश्वर थे.बडोदा शहर के समीप होने से वहाँ के अनेक भक्तों को श्रीस्वामी के दर्शन करना अत्यंत सुलभ हो गया था.
चान्दोड़ से एक नाव में बैठकर कुछ बड़ोदा के भक्तजन गरुडेश्वर आ रहे थे.उस नाव में एक विधवा महिला भी थी. नाव में सवार कुछ व्यक्ति जहांनाम स्मरण में लगे हुवे थे, वही कुछ लोग उस विधवा महिला कों बिना किसी कारण जली-कटी बातों से अपमानित करते रहते है.
वह अकेली महिला करती तो भी क्या ? और शिकायत करती तो भी किससे? वह चुपचाप अपना सर झुकाए आँसुभरी आँखेंलिए बैठी रहती है.
आखिर कुछ घंटों बाद नाव आखिर गरुडेश्वर पहुँच ही जाती है, वहाँ पहुँचते-पहुँचते रात हो जाती है.

१५ जैसा अधिकार वैसा उपदेश


उस समय श्रीस्वामी का मुक्काम श्री क्षेत्र नृसिंहवाड़ी में था. स्वामीजी का भिक्षा के बाद का भोजन ब्रह्मानंद स्वामी के मठ की उपरी मंजिल पर होता था. स्वामीजी के भोजन के पश्चात उनकी झूठी पत्तल उठाकर उसके नीचे की जमीन को लिप कर साफ़ करने का पुण्य मिले, इस कारण से वहाँ की स्थानीय महिलाओंकी आपस में अकसर तकरार और झड़पें होती रहती थी, कभी-कभी महिलाओं में तो झगड़े की नौबत आ जाया करती थी.
 ‘पता नहीं मेरे भोजन के पश्चात आज क्या होगा’ इस विचार  से श्रीस्वामी को उन दिनों ढंग से खाना भी खवाता था या नहीं !
एक बार एक दूरस्थ महिला की भी श्रीस्वामी की झूठी पत्तल हटाकर श्रीस्वामी की झुठन साफ़ करने की इच्छा हुई, पर यह कैसे संभव था ? स्थानीय महिलाओं को आपस में जूझते देख वह दूरस्थ महिला चुपचाप दूर खड़ी रहती थी.

१४ हर कार्य का उचित समय होता है

उस समय श्री स्वामी का वास्तव्य श्री क्षेत्र माणगाँव में था. तब एक सज्जन हर शनिवार को सावंतवाड़ी तालुका से स्वामी जी के दर्शन के लिए माणगाँव आते थे,वहाँ पर रविवार के दिन रुकते थे, और सोमवार को तड़के ही उठकर अपने तालुका पहुँचकर अपनी नौकरी में हाजिर हो जाते थे.
पहिले कुछ दिन उन्होंनेस्वामी जी की परीक्षा देखने का मानस बनायाहुवा था.
एक दिन वे बैलगाड़ी से श्री क्षेत्र जाने के बजाय पैदल ही १४ किलोमीटर चलकर माणगाँव पहुँचते है, साथ में एक पात्र में दूध भी रख लेते है.

१३ सर्वज्ञ श्री स्वामी


जब श्रीक्षेत्र हवनुर में स्वामीजी का चातुर्मास था, तब एक अमीर महिला अपने मुनीम के साथ श्रीस्वामी के दर्शन करने आती है. श्रीस्वामी के चरण स्पर्श के बाद मुनीमजी अपनी सेठानी की दारुण समस्या से स्वामीजी को अवगत कराते है-“
स्वामीजी, जब भी सेठानी जी गर्भधारण करती है तब गर्भधारण के ५-६ महीनों के पश्चात उनके पति पर एक रहस्यमय दौरा पड़ता है, पति देव का तो दिमाग ही घूम जाता है, और जब तक बालक जन्म लेकर जीवित रहता है, तब तक दौरा बना ही रहता है; उस बालक के निधन होने के बाद पति देव फिर से सामान्य हो जाते है.
अभी तक ऐसा ३-४ बार हो चूका है, अब फिर से सेठानी जी पेट से है, और पुरानी यादों से उनके प्राण ही सूखे जा रहे है.इस संकट से छुटकारा दिलाने में स्वामी चरण समर्थ है.”

१२ सुख के सब रिश्ते-नाते, दुःख में सिर्फ सद्गुरु का सहारा

उस समय श्री स्वामी का मुक्काम नृसिंहवाड़ी में था. स्वामीजी के आने के कारण वहाँ का तो माहोल ही बदल गया था. लोगों की आवाजाहीअत्यधिक होने से टाँगे-वालों ने अपना किराया बढ़ा दिया था, पुजारियों को उनके भोजन के लिए भी समय ना मिले इतनी उनकी व्यस्तता हो गई थी. सुबह तडके ४ बजे से ठीक आधी रात तक मंदिर व ब्रह्मानंदस्वामी के मठ में चहल-पहल रहा करती थी, जहां जाओ वहाँ पर श्री स्वामी की लीलाये कानों पर पड़ती थी, और भक्ति भाव को और भी दृढ़ कर देती थी.

११ पथ-प्रदर्शक श्रीस्वामी

इसवी सन १९११ साल की ये बात है . पुणे के एक शिक्षक परिवार में ३ मूर्तियाँ थी- वह स्वयं, उनकी धर्मपत्नी और एक ४ वर्षीय बालक. उस समय श्री स्वामी का चातुर्मास निजाम संस्थान के अंतर्गत आने वाले श्री क्षेत्र कुरवपुर में श्रीकृष्णा नदी के तट पर श्री वल्लभ स्वामी मंदिर के टापू पर था.
एक उल्लेखनीय बात यह है कि श्री रामदास स्वामी की जन्म स्थली जाम्बगाँव, नृसिंह सरस्वती की कर्म भूमिश्री क्षेत्र गाणगापुर एवं एकनाथ महाराज का शहर पैठण, ये सभी निजाम संस्थान के अंतर्गत आते थे.
यह छोटा सा परिवार श्री स्वामी के दर्शन के लिए प्रस्थान करता है. उस समय पूरा भारत देश प्लेग की महामारी से ग्रस्त था. हजारों लोग काल-कवलित हो रहे थे. इसलिए उन दिनों प्लेग के कारण जगह-जगह क्वारंटाइन लागू किया जाता था. क्वारंटाइन अर्थात रोगग्रस्त क्षेत्र से आने वाले लोगों को कुछ समय के लिए किसी बाहरी स्थान पर रोककर रखना ताकि उनमें से अगर कोई रोगग्रस्त हो (और उसके लक्षण प्रगट न होने से उपरी तौर पर स्वस्थ दिखता हो ) तो उसके कारण गंतव्य की जगह में यह रोग ना फैले.