एक स्नातक ब्राह्मण
सज्जन एक अच्छे पद पर नियुक्त थे, उनकी श्रीस्वामी में अपार श्रद्धा थी. जरा सी छुट्टियाँ
मिली नहीं कि वे श्री चरणों में जाकर अपनी सेवा प्रदान किया करते थे. उनका एक
अच्छा मित्र स्वदेशी का आग्रही व्रत धारी था. उस समय देश पराधीन था और स्वतंत्रता
के लिए अनेक प्रयत्न चल रहे थे जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार भी शामिल था.
एक दिन ये ‘स्वदेशी के भक्त’ ब्राह्मण-महोदय से बहस करने लगे,
‘कहिये,
स्वामीजी के स्वदेशी के बारे में क्या विचार है ?’
ब्राह्मण महोदय ने
अत्यंत प्रांजलतापूर्वक कहा, ‘ स्वामीजी से वाद करने की न तो मेरी पात्रता है और न हि
सद्गुरु से वाद करने की कोई पद्धति होती है. उनकी आज्ञा का प्रेम व आदरपूर्वक पालन
करना ही मेरा परम व्रत है.'